कई प्रकार के लोग रहते हैं भारत में । कहने को तो हम भारत के हैं मगर हमने कभी भारत को अपना माना नहीं। माने ने भी क्यों दीया ही क्या है भारत ने , हमेशा लिया ही तो है । कभी हमारे पूर्वजों का बलिदान कभी स्वतंत्रता का संग्राम।
विदेशी आक्रांताओं की मार झेली है भारत ने, उसमें भी कई लोगों की जान ही ली है। कितने मूर्ख थे वह लोग की बिना बात का उन लोगों ने जान दे दी। उन्हें तो इस बात का भान भी नहीं होगा की जिस बात के लिए जान दे रहे हैं वे लोग उस जान की कीमत भविष्य में दो कौड़ी की भी नहीं रखेंगे इसी भारत के लोग। महाराणा प्रताप को क्या पता था कि उनके मरने के बाद इसी भारत भू के लोग उन्हें लूटेरा कहना शुरू कर देंगे। गुरु गोविंद सिंह को क्या पता था कि उनके बच्चे जिन्होंने इस राष्ट्र निर्माण के लिए अपनी जान कुर्बान करने से पहले एक बार भी नहीं सोची की उनकी कुर्बानी भविष्य में बेकार जाने वाली है, वीर शिवाजी ने कभी सोचा होगा की जिस राष्ट्र की कल्पना में उन्होंने पूरा जीवन दे दिया उसका भविष्य ऐसा होने वाला है, जिस राष्ट्र पुरुष के लिए 73 लाख हिंदुओं ने बलिदान दिया उन को कहां पता था कि उनके मरने के बाद भी श्री राम पर हिंदू ही राजनीति करेंगे और मंदिर नहीं बनाने के लिए हर जी तोड़ कोशिश करेंगे।
बेवकूफ थे वह स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी लोग जिन्होंने अपनी जान इस देश को आजाद करने के लिए दे दी। उन्हें क्या पता था इस देश में आने वाली नस्लें ₹1 के चावल के लिए अपने देश को बेच डालेंगे। उन जान देने वाले शहीदों को क्या पता था की इस देश में किसानों को ही भिखारी बना दिया जाएगा, कभी कर्जा देने के नाम पर कभी कर्जा माफ करने के नाम पर।
किसानों को भी बेवकूफ बनाने में हमारे राजनेताओं का सानी नहीं है। जब किसान कर्जा मांगने जा रहे थे तब किसी राजनेता ने घोषणा कर दी कि मेरी सरकार आएगी तो हम आपको कर्जा जरूर देंगे। बेचारे सीधे-साधे किसान उन के चक्कर में उन्हें जीता दिया और ऊपर वाले का करम देखो उन लोगों ने उन्हें कर्जा भी दिला दिया, किसानों को लगा यही लोग तो सब कुछ हैं हम किसानों के लिए।
अब बारी आई कर्जा चुकाने की तब पता चला की किसानों की कमाई इतनी नहीं हो पाई कि वे लोग कर्जा चुका पाते और उसका कारण वही नेता लोग और उनके अंदर काम करने वाले लालफीताशाही के लोग जिन्हें किसानों के भला से ज्यादा चुनावी खर्चे का पैसा का इंतजाम कैसे हो इस बात पर ज्यादा जोर दिया । इस वजह से किसानों को अपनी फसलों का उचित समर्थन मूल्य ना मिल पाया, किसानों को जो सरकारी सहायता पहुंचने वाली थी उसमें भी नेता, अधिकारी, ठेकेदार और दलालों ने लीपापोती कर के किसानों के हक मार दिया। आखिर भुगतना तो किसानों को ही था सो भुगता भी किसानों ने ही। किसान की कमाई में सेंध लग जाने की वजह से किसान कर्ज चुकाने में अक्षम रहे। किसान कर्ज के बोझ में आत्महत्या तक करने लगे, क्योंकि किसान भिखारी नहीं होता है, बेगैरत नहीं होता है, उनके अंदर इंसानियत होती है ,इज्जत होती है, मान होता है, सम्मान होता है और सबसे बढ़कर स्वाभिमान होता है। अपने स्वाभिमान की रक्षा करने हेतु कर्ज में डूब जाने की वजह से उनके सामने मरने के अलावा कोई चारा नहीं बचा।
अब जो किसान बचे हैं उनके लिए एक नया स्कीम आया वह स्कीम था कर्जा माफी वाला स्कीम, जिसके तहत जिन किसानों ने सरकारी बैंकों से कर्ज लिया उस कर्जे को माफ कर दिया जाएगा।
अब सोचने वाली बात यह है की पहले जो सरकार ने कर्जा दिया था और अब जो सरकार कर्जा माफ कर रही है इन दोनों में समानता क्या है। तो समानता की अगर बात करें तो दोनों में सिर्फ एक ही समानता है और वह है वोट बैंक की राजनीति।
किसी राजनेता ने या किसी राजनैतिक महत्वाकांक्षी ने किसानों को ऊपर उठने के लिए और उन्हें सहयोग करने के लिए आगे नहीं बढ़े। उन्होंने तो सिर्फ एक तरफ कर्जा देने की बात की दूसरी तरफ कर्जा माफ करने की बात की।
मगर घोर आश्चर्य की बात यह है की भारत जो किसानों के देश है इस देश में सभी किसानों को अगर कर्जा आसानी से मिल जाए और उस कर्जे को माफ कर दिया जाए, तो एक तरह से हमने उन किसानों को एक बड़े अस्तर का भिखारी ही बना दिया ना। अब उन किसानों के अंदर की मानसिक स्थिति यही बनेगी की बस कर्जा लो और उसे भूल जाओ चाहे खेती हो या ना हो।
कभी किसी राजनेता ने यह नहीं सोचा कि अगर कर्जा माफ हो जाता है तो भारत के राजस्व की हालत क्या होगी ? भारत की आर्थिक स्थिति पर कितना बड़ा आघात लगेगा? दोबारा हम उन किसानों का कर्जा दे पाएंगे या नहीं ?
भलाई के काम राजनेताओं का थोड़े ही ना है उन्हें तो बस वोट चाहिए जो उन्हें कभी कर्जा देकर मिल जाता है कभी कर्जा माफ करके मिल जाता है। हमें तो सिर्फ अपनी रोटी सेकनी आती है और चाहे देश का नुकसान हो चाहे किसानों का राजस्व जाए भाड़ में मुझे क्या?
आश्चर्य की बात यह है कि यह घटना सिर्फ किसानों के साथ ही नहीं हो रही इस तरह के लोकलुभावन, वोटों की खरीद-फरोख्त और समाज को बरगलाने के लिए हर तबके के लिए नए-नए स्कीम हर चुनाव के घोषणा पत्र में दिए गए रहते हैं वह भी ठीक उसी प्रकार से जैसे किसी कंपनी को अपना सामान बाजार में लांच करना होता है तो सबसे पहले बड़े-बड़े ऑफर लाया करती है।
इस तरह के बड़े-बड़े ऑफर जनता के सामने लाने पर ज्यादा से ज्यादा क्या होगा, भारत को दूसरे देशों से कर्ज लेना पड़ेगा ताकि हम यहां के किसानों को कर्ज दे सके और उसे माफ कर सके। और ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकता है हम विदेशों के कर्ज चुकाने में अक्षम रहेंगे और देश के बाहर के लोग भारत में आकर भारत के लोगों पर शासन करेंगे , अपनी हुकूमत चला सकेंगे। जरा सोच कर देखिएगा की जब कोई कर्जा लेता है तो उसे अपने घर में आने से कोई रोक सकता भी है क्या ? अब जरा यह सोचिए की हमारे देश में जो हमारे पूर्वजों ने बलिदान दिया उसके बलिदान की कीमत हम भारत के लोग किस प्रकार चुका रहे हैं ?
हमारे देश के लोग बहुत महान लोग हैं उनकी तुलना इस पृथ्वी पर तो किसी से नहीं की जा सकती।
हमारे देश के नेता दूरबीन लेकर भी पूरे ब्रह्मांड में भी नहीं खोजे जा सकते हैं।
खैर मैं तो शांति से अपने घर में बैठा हूं , इस इंतजार में की अगली बार कौन आएगा और कौन से लुभावने ऑफर देगा और वह हमारी राजगद्दी संभालेगा। आज यह ऑफर तो हमारे ही देश के नेता लोग दे रहे हैं मगर वह दिन दूर नहीं जब इस देश के बाहर के लोग कुछ नायाब ऑफर लाकर देने की बात करेंगे और हम भारत के अजीबो गरीब लोग उन्हें भी वोट देकर गद्दी पर बैठा ने से नहीं चुकेंगे।
इन सब चीजों को देख कर बड़ा ही प्रसिद्ध लाइन याद आ गई
अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।
लेख: रितेश कश्यप
Twitter : meriteshkashyap
पत्रकार एवं लेखक


Good
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