हिंदुओं को आपस में बांटने का एक नया "षडयंत्र"
कुछ दिनों पहले मैं समाचार पत्र देख रहा था तो इसी बीच में एक खबर जो खबर के नजरिए से ना देखते हुए मुझे कुछ षडयंत्र की दुर्गंध आई । मैं उसे लेख को लगभग तीन या चार बार पढ़ा और पढ़ने के बाद बड़ा ही निराशा जनक ख्याल आने लगे क्योंकि बात ही कुछ उत्साहवर्धक नहीं थी।
मैंने उस वक्त इस खबर पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया मगर 4 अक्टूबर 2018 को एक पत्र जो एक आदिवासी समुदाय के तथाकथित हितैषी संस्था के द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री को दिया गया था।
इस पत्र के लिखे गए बातों को और कूतथ्यों को देख कर मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि यह पत्र एक आग्रह है, एक चेतावनी, एक बेवकूफी या फिर किसी के षडयंत्र का नतीजा है अब षड्यंत्र तो वहीं करेगा जिसे समाज के तोड़ने या टूटने से लाभ पहुंचने वाला है।
अब मैं अपने पाठकों से ही तय करने को कहूंगा कि वह इस पत्र को किस रूप में देखेंगे , इसलिए अब मैं एक पत्र एवं कुछ दिनों पहले समाचार पत्र में छपे गए एक खबर के कुछ बिंदुओं को रखने जा रहा हूं।
यह खबर झारखंड के खूंटी जिले की है जो 26 अगस्त 2017 छपी थी।
खूंटी जिले में एसपी साहब और डीएसपी साहब सहित कई अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था और सबसे बड़ी बात क्या है कि बंधक बनाने का कारण जो था वह बड़ा ही आश्चर्यजनक था, गांव वालों का कहना था कि आने वाले दुर्गा पूजा में रावण और कुम्भकर्ण का पुतला नहीं जल सकता क्योंकि वह उनके पूर्वज थे और इसके लिए गांव वालों ने ग्राम सभा भी की और यह भी निर्णय लिया गया कि जो रावण का पुतला दहन करेगा उस पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया जाएगा ।
बात जब खूंटी जिले की होगी तो वहां जो लोग पत्थलगड़ी गैंग में शामिल थे तो शक की सुई तो वहां भी जा ही सकती है, जबकि मैं शक करने की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं तो पूरे विश्वास से यह बात कह रहा हूं।
दिनांक 04 अक्टूबर 2018 की घटना है जो बिहार की घटना है उस पर जिक्र करते हुए आपको बताना चाहता हूं कि बिहार आदिवासी विकास परिषद के द्वारा एक पत्र जारी किया गया जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से रावण का पुतला दहन को रोकने के लिए और इस कृत्य को उनके धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया गया।
अब आते हैं हम लोग कुछ मूल विषयों पर , क्या इस तरह के पत्र एक साल पहले झारखंड में जारी करना उसके 1 साल के बाद बिहार में भी जारी करना क्या आप लोगों को कुछ अलग सा महसूस नहीं हो रहा? क्या यह विचार भ्रमण करते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर विचरण नहीं कर रहा?
कुछ दिनों के बाद अगर कोई अंग्रेजों को अपना देवता मानने लगे तो आश्चर्यजनक बात ना होगी, कोई कहेगा कि ओसामा बिन लादेन हमारा धर्म गुरु था तो भी आश्चर्य करने की कोई बात नही होगी क्योंकि हमारे यहाँ तो धार्मिक आजादी के नाम का हथियार भी तो है।
अब मैं आता हूं दूसरे विषय पर असलियत में उन आदिवासियों का कोई दोष नहीं जो यह बात बता रहे हैं कि रावण उनके वंशज थे। अब आप कहोगे कि दोष फिर किसका है और मैं कहूंगा यही तो समझने वाली बात है कि आखिर आदिवासी हिंदू नहीं है तो इस बात का लाभ कौन उठा सकता है, आपको जवाब स्वतः मिल जाएगा ।
झारखंड और बिहार सहित पूरे भारतवर्ष में 3 समूह बड़े जोर-शोर से लगा हुआ है। एक समूह तो राजनीति से संबंध रखता है वहीं दूसरा समूह पत्रकारिता से जुड़ा है और तीसरा समूह जो ऊपर दोनों समूह को देख रहा है , वह सिर्फ और सिर्फ धर्म से संबंध रखता है । अगर आदिवासी अपने आप को हिंदू से पृथक मानेंगे तो उन्हें दूसरे धर्म में मिलाने वाले लोगों को बड़ी आसानी होगी अपने धर्म मे जोड़ने में और उसके लिए सबसे पहले उन आदिवासियों को हिंदू संस्कृति से दूर करने के लिए कई योजनाएं बनानी पड़ेगी । उनमें से कुछ योजनाएं चल रही है। वैसे भी कई जगहों से आदिवासियों का अलग धर्म को लेकर आवाज उठने लगी तो है ही , जो उनका प्रथम चरण के अंतर्गत आता है। उसके बाद द्वितीय चरण में उन्हें लोभ और लालच दिखा कर धर्म परिवर्तन करा देना होता है।
खैर निर्णय तो पाठकों को लेना है और समझने का प्रयास भी पाठकों को ही करना है मैं तो मन की बात करने बैठा था जो मैंने कर दिया।
वैसे इस तरह की घटनाएं और कई जगह घट चुकी हैं , जहां रावण वध का विरोध होता रहा है और महिषासुर की पूजा भी होती रही है और उसे हर वक्त अपनी संस्कृति का हिस्सा बताते हुए उसे सत्यापित करने का अवसर ढूंढा जाता रहा है। उसके कई तरह के फोटो और अखबारों के कटिंग को मैं यहाँ पोस्ट कर रहा हूं आप उन्हें भी देख सकते हैं ।
रितेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार
Twitter : meriteshkashyap
FACEBOOK: @riteshkashyap
कुछ दिनों पहले मैं समाचार पत्र देख रहा था तो इसी बीच में एक खबर जो खबर के नजरिए से ना देखते हुए मुझे कुछ षडयंत्र की दुर्गंध आई । मैं उसे लेख को लगभग तीन या चार बार पढ़ा और पढ़ने के बाद बड़ा ही निराशा जनक ख्याल आने लगे क्योंकि बात ही कुछ उत्साहवर्धक नहीं थी।
मैंने उस वक्त इस खबर पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया मगर 4 अक्टूबर 2018 को एक पत्र जो एक आदिवासी समुदाय के तथाकथित हितैषी संस्था के द्वारा बिहार के मुख्यमंत्री को दिया गया था।
इस पत्र के लिखे गए बातों को और कूतथ्यों को देख कर मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि यह पत्र एक आग्रह है, एक चेतावनी, एक बेवकूफी या फिर किसी के षडयंत्र का नतीजा है अब षड्यंत्र तो वहीं करेगा जिसे समाज के तोड़ने या टूटने से लाभ पहुंचने वाला है।
अब मैं अपने पाठकों से ही तय करने को कहूंगा कि वह इस पत्र को किस रूप में देखेंगे , इसलिए अब मैं एक पत्र एवं कुछ दिनों पहले समाचार पत्र में छपे गए एक खबर के कुछ बिंदुओं को रखने जा रहा हूं।
यह खबर झारखंड के खूंटी जिले की है जो 26 अगस्त 2017 छपी थी।
खूंटी जिले में एसपी साहब और डीएसपी साहब सहित कई अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था और सबसे बड़ी बात क्या है कि बंधक बनाने का कारण जो था वह बड़ा ही आश्चर्यजनक था, गांव वालों का कहना था कि आने वाले दुर्गा पूजा में रावण और कुम्भकर्ण का पुतला नहीं जल सकता क्योंकि वह उनके पूर्वज थे और इसके लिए गांव वालों ने ग्राम सभा भी की और यह भी निर्णय लिया गया कि जो रावण का पुतला दहन करेगा उस पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कराया जाएगा ।
बात जब खूंटी जिले की होगी तो वहां जो लोग पत्थलगड़ी गैंग में शामिल थे तो शक की सुई तो वहां भी जा ही सकती है, जबकि मैं शक करने की बात नहीं कर रहा हूँ, मैं तो पूरे विश्वास से यह बात कह रहा हूं।
दिनांक 04 अक्टूबर 2018 की घटना है जो बिहार की घटना है उस पर जिक्र करते हुए आपको बताना चाहता हूं कि बिहार आदिवासी विकास परिषद के द्वारा एक पत्र जारी किया गया जिसमें बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से रावण का पुतला दहन को रोकने के लिए और इस कृत्य को उनके धार्मिक स्वतंत्रता से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया गया।
अब आते हैं हम लोग कुछ मूल विषयों पर , क्या इस तरह के पत्र एक साल पहले झारखंड में जारी करना उसके 1 साल के बाद बिहार में भी जारी करना क्या आप लोगों को कुछ अलग सा महसूस नहीं हो रहा? क्या यह विचार भ्रमण करते हुए एक स्थान से दूसरे स्थान पर विचरण नहीं कर रहा?
अब कुछ तथ्यों के साथ में बात करना चाहूंगा की जो रावण और उसके भाइयों के हितैषी बने हुए हैं । उन्हें कितनी जानकारी होगी यह तो उनके पत्र से पता चल ही गया, मगर साथ ही साथ उन्हें इस बात की जानकारी दे देना ज्यादा अच्छा होगा कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण पुलस्त्य मुनि का पोता था अर्थात् उनके पुत्र विश्वश्रवा का पुत्र था। विश्वश्रवा की वरवर्णिनी और कैकसी नामक दो पत्नियां थी। वरवर्णिनी के कुबेर को जन्म देने पर सौतिया डाह वश कैकसी ने अशुभ समय में गर्भ धारण किया।
इसी कारण से उसके गर्भ से रावण तथा कुंभकर्ण जैसे क्रूर स्वभाव वाले भयंकर राक्षस उत्पन्न हुए। अब इस प्रकार से रावण तो एक ब्राह्मण था जो अपने जप और तप से अपने आप को शक्तिशाली बना चुका था और उसी ने समस्त भारतवर्ष में जो उत्पात मचाया था , वह उत्पात असहनीय और अकल्पनीय था। उसनेे अपने ताकत के वजह से यहां के लोगोंं को उसका साथ देने को मजबूर किया और तो और उस के सबसे बड़े पीड़ित वर्ग में भारतवर्ष के वनवासी और आदिवासी ही थे। उसके शोषण के वजह से जब भगवान राम वनवास काटते वक्त उन आदिवासियों के बीच पहुंचे तो उन्हीं आदिवासियों ने मिलकर भगवान राम से दुष्ट रावण का नाश करने को कहा और राम जी का भरपूर साथ दिया जिससे रावण के साथ रावण के सभी भाइयों का और रावण के समस्त खानदान का विनाश संभव हुआ।
मैं उन रावण समर्थकों से फिर कहना चाहता हूं कि अगर वह लोग मेरे लिखे गए बातों का भरोसा नहीं करते हैं तो रावण का इतिहास रामायण छोड़ कर और कहां पढ़ लिया और अगर रामायण में ही पढ़ा है तो फिर यह विषय उनसे कैसे छूट गया।कुछ दिनों के बाद अगर कोई अंग्रेजों को अपना देवता मानने लगे तो आश्चर्यजनक बात ना होगी, कोई कहेगा कि ओसामा बिन लादेन हमारा धर्म गुरु था तो भी आश्चर्य करने की कोई बात नही होगी क्योंकि हमारे यहाँ तो धार्मिक आजादी के नाम का हथियार भी तो है।
अब मैं आता हूं दूसरे विषय पर असलियत में उन आदिवासियों का कोई दोष नहीं जो यह बात बता रहे हैं कि रावण उनके वंशज थे। अब आप कहोगे कि दोष फिर किसका है और मैं कहूंगा यही तो समझने वाली बात है कि आखिर आदिवासी हिंदू नहीं है तो इस बात का लाभ कौन उठा सकता है, आपको जवाब स्वतः मिल जाएगा ।
झारखंड और बिहार सहित पूरे भारतवर्ष में 3 समूह बड़े जोर-शोर से लगा हुआ है। एक समूह तो राजनीति से संबंध रखता है वहीं दूसरा समूह पत्रकारिता से जुड़ा है और तीसरा समूह जो ऊपर दोनों समूह को देख रहा है , वह सिर्फ और सिर्फ धर्म से संबंध रखता है । अगर आदिवासी अपने आप को हिंदू से पृथक मानेंगे तो उन्हें दूसरे धर्म में मिलाने वाले लोगों को बड़ी आसानी होगी अपने धर्म मे जोड़ने में और उसके लिए सबसे पहले उन आदिवासियों को हिंदू संस्कृति से दूर करने के लिए कई योजनाएं बनानी पड़ेगी । उनमें से कुछ योजनाएं चल रही है। वैसे भी कई जगहों से आदिवासियों का अलग धर्म को लेकर आवाज उठने लगी तो है ही , जो उनका प्रथम चरण के अंतर्गत आता है। उसके बाद द्वितीय चरण में उन्हें लोभ और लालच दिखा कर धर्म परिवर्तन करा देना होता है।
खैर निर्णय तो पाठकों को लेना है और समझने का प्रयास भी पाठकों को ही करना है मैं तो मन की बात करने बैठा था जो मैंने कर दिया।
वैसे इस तरह की घटनाएं और कई जगह घट चुकी हैं , जहां रावण वध का विरोध होता रहा है और महिषासुर की पूजा भी होती रही है और उसे हर वक्त अपनी संस्कृति का हिस्सा बताते हुए उसे सत्यापित करने का अवसर ढूंढा जाता रहा है। उसके कई तरह के फोटो और अखबारों के कटिंग को मैं यहाँ पोस्ट कर रहा हूं आप उन्हें भी देख सकते हैं ।
रितेश कश्यप
स्वतंत्र पत्रकार
Twitter : meriteshkashyap
FACEBOOK: @riteshkashyap















अगर आदिवासी अपने आप को हिंदू से पृथक मानेंगे तो उन्हें दूसरे धर्म में मिलाने वाले लोगों को बड़ी आसानी होगी.... इस बात से सम्पूर्ण सहमत हूँ. इस विषय में हमारा कार्य हमेशा नाकाफी रहेगा क्यों की रचनात्मक कार्य की तुलना में विध्वंसक कार्य ज्यादा तेज़ी से आगे बढ़ता है और तरक्की करता है. फिर भी अगर हम हमारे प्रयास चालू रखते है तो एक न एक दिन इन सब विध्वंसक ताकतों को हराने की उम्मीद कर सकते है.
ReplyDeleteAapki kahi hui baatein bilkul sahi hai aakhir aaj hi kuu janjaatiyon ko raavan apna purvaj lagne laga hai
ReplyDeleteYe kuch tathakathit logon dwaara behlaaye jaa rhe hai aur anpadh hone tatha duniya se piche hone k wajah se ache aur bure ka antar nii samajh rhe hai
विचारणीय मुद्दा है यह आप के मन की पीड़ा को नहीं समय से समझा गया तो यह देश की पीड़ा का रूप लेगी एक दिन हिंदू समाज को तोड़ने की कोशिश की जा रही है ऐसी ताकतों को विफल करना होगा तभी हम अपने देश और समाज को बचा सकते है
ReplyDeleteसमस्याजनक तथ्य है।परंतु हिंदुओं को इस बात को समझना होगा कि हमारे पूर्वज एक थे और बाद में कुछ असामाजिक लोग अपने स्वार्थ के लिए विलगाव का बीज हिन्दुओ में बो दिए। जहां तक राम रावण का मुद्दा है । राम आदर्श पुरुष और बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक है इस कारण इन्हें सम्मान और पूजा जाता है। अब हमारे घर मे ही चोर या आतंकवादी हो तो क्या हम उसे संरक्षित करेंगे कभी नही चाहे हमारी जात का हो या हमारी विरादरी का,रावण के नाश के लिए सारे राम को एक साथ मिलना होगा ।सारे हिन्दू राम के वंशज है।
ReplyDeleteआपका लेख पढ़ कर सोच में पड़ चुका हूँ। समाज का कुछ लोगों का षड्यंत्र हैं, जो समाज के एकता को तोड़ना चाहते हैं। ऐसे शरारती तत्वो से बच कर हमें रहना चाहिए,इसके लिए समाज मे जागरूकता फैलाना चाहिए।
ReplyDeleteजय शेरावाली महिषासुरमर्दिनि की।
ReplyDeleteजय वनराज।
अरे दोगले दलालो तुम सैकड़ों वर्षों से झारखंड के मुण्डा, उराँव आदि वनवासी जनजाति समाज को बताते आ रहे हो कि महिषासुर (महेषा मुर्मू ) है जो तुम्हारे राजा सह पूर्वज हैं।
और अभी -अभी गत दो-चार सालों से तुमने मध्यप्रदेश (विशेषकर बैतूल, मंडला, बालाघाट, सिवनी, जबलपुर, शहडोल, रायसेन, होशंगाबाद, हरदा जो गोंड जनजाति बाहुल्य जिले हैं ) में भी चिल्लाना शुरू किया है कि महिषासुर (बोदाल पेन) हमारे गोंड जनजाति समाज का है।
और तुम उसका गोत्र भी ढूंढ लाये कि महिषासुर और रावण मंडावी गोत्र के हैं।
और उधर झारखंड में बताते हो कि महिषासुर और रावण "मुर्मू " गोत्र के हैं ।
अरे दोगले दलालो ये बताओ सही क्या है ?
झारखंड वाला महिषासुर (महेषा मुर्मू ) या मध्यप्रदेश वाला महिषासुर (बोदाल पेन मंडावी) ?
अरे दलालो तुमने झारखंड के मुण्डा, उराँव जनजाति समाज को राक्षस महिषासुर (महेषा मुर्मू )से जोड़कर वहाँ अलगाववाद, नक्सलवाद फैलाने की कोशिस की और लम्बे समय तक उस क्षेत्र में अशांति बनाई रखी , और हजारों-हजार हमारे जनजाति भाईयों की हत्याएं करवाई हैं। फिर भी तुम वहाँ सफल नहीं हुए।
तुम वही काम मध्यप्रदेश में राक्षस महिषासुर (बोदाल पेन मंडावी ) के नाम से यहाँ के गोंड समाज को मूर्ख समझ कर करना चाहते हो ?
जिसमें तुम कभी सफल नहीं होगे।
हमारे गोंड समाज के भाई -बहिन भले ही कम पढ़े-लिखे हों पर मूर्ख नहीं , जो तुम उन्हें बेवकूफ बनाकर हमारा धर्म बदलवा लोगे । यहाँ गोंड समाज का सहारा लेकर नक्सलवाद पैदाकर मध्यप्रदेश को अशांत बना दोगे !! सावधान !!!!
मध्यप्रदेश का गोंड, कोरकू, भील, भिलाला, बारेला, पटल्या, सहरिया आदि जनजाति, वनवासी समाज देशभक्त, धर्मनिष्ठ है वह तुम्हें मुँहतोड़ जबाव देगा।
हम गोंड समाज के लोग उस बोदाल पेन के, उस रावण के वंशज नहीं जिन्होंने समाज को कष्ट दिए ।
हम गोंड समाज के लोग उस धर्मनिष्ट ,बहादुर महाराजा शंंकर शाह कुँवर रघुनाथ शाह के वंशज हैं जिन्होंने तोप के मुँह में बँधकर अपने शरीर के टुकड़े-टुकड़े करवाना मंजूर किया पर "ईसाईयत" को स्वीकार नहीं किया।
दलालो तुम्हारा प्रयास भी यही है कि यह बहादुर, धर्मनिष्ठ गोंड समाज दूसरे धर्म की शरण में कैसे आये और आपस में कैसे झगड़ें मरें तब तुम खुश होगे।
इसमें तुम्हारा दोष नहीं तुम जिस "ईश्वर के बेटे" प्रभु के दूत के जाल में फँस गये हो उसका उद्देश्य भी समाज में छल-कपट व लालच से वैमनस्य फैलाना, अशांति पैदा करना, झगड़े कराना रहा है।
"वनराज"
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