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Thursday, 16 August 2018

अटल परिचय । अटल बिहारी वाजपेई जी के जीवन पर एक नजर | ठन गई! मौत से ठन गई!



नमस्कार मित्रों मैं रितेश कश्यप आज ऐसे व्यक्तित्व के बारे में बात करने जा रहा हूं जिन पर बात करना या कुछ लिखना अपने आप में एक साहसिक कार्य है क्योंकि ऐसे व्यक्तित्व के बारे में कुछ भी लिख पाना असंभव है क्योंकि जिसने अपना पूरा जीवन राष्ट्रधर्म का पालन करने में लगा दिया और जो काम वह करके चले गए वह शब्दों में उल्लेख नहीं किया जा सकता।
आज 16 अगस्त 2015 श्याम 5:30 बजे समाचार चैनल पर ऐसी खबर सुनी कि ऐसा लगा कि मानो शरीर पर वज्राघात हो गया।
हम सबके प्रिय परम श्रद्धेय भारत रत्न से सम्मानित श्री अटल बिहारी वाजपेई जी का स्वर्गवास हो गया और यह खबर एक आग की तरह फैल गई सहारा ट्विटर WhatsApp फोन अपने आप में अटलमय बन चुका था।
आज जो ट्विटर युद्ध का स्थल बना रहता था आज वह शोकमग्न है जो Facebook एक दूसरे पर वाक् युद्ध से पटा रहता था आज अटल जी के नाम पर समाप्त हो चुका था। जो WhatsApp हर वक़्त ज्ञान की गंगा बहा कर रहा था आज शोकमग्न था।
राजनीति के युगपुरुष और इतने बड़े व्यक्तित्व का निधन कोई छोटी बात ना थी।
व्यक्तित्व के कितने धनी थे इस बात से पता चलता है कि सारे विरोधी और सारे समर्थक आज एक मंच पर खड़े थे और सब की आंखों में आंसू थे ।

श्री अटल बिहारी वाजपेई जी के निधन पर उन्हीं की लिखी गयी एक कविता जो शायद आज के ही परिपेक्ष्य में लिखी गयी थी।

ठन गई! 
मौत से ठन गई!  

जूझने का मेरा इरादा न था,
मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था,

रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।

मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।

मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?

तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।

मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र,
शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।

बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।

प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।

हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये,
आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए।

आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है।

पार पाने का क़ायम मगर हौसला,
देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई।

मौत से ठन गई।

~ मौत से ठन गई / अटल बिहारी वाजपेयी



अटल बिहारी वाजपेयी जीवन परिचय

- 25 दिसंबर 1924 में ग्वालियर में जन्म हुआ

- सरस्वती शिशु मंदिर से स्कूली शिक्षा पूरी हुई

- लक्षमीबाई कॉलेज ग्वालियर से स्नातक की पढ़ाई की

- डीएवी कॉलेज कानपुर से परास्नातक की उपाधि ली



भारत छोड़ों आंदोलन से सियासी सफर की शुरुआत

1942 : भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया, संघ की गतिविधि में शामिल होने के कारण 24 दिन जेल में रहे

1951 : जनसंघ में शामिल हुए, 1957 में दल के नेता के रूप में स्थापित हुए

1957 : पहली बार उत्तरप्रदेश के बलरामपुर से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए

1962 : राज्यसभा के लिए पहली बार निर्वाचित हुए

1968 : जन संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने

1975 : आपातकाल के दौरान गिरफ्तार किया गया

1977-79 : मोराजी देसाई सरकार में विदेशमंत्री बने

1980 : भाजपा की स्थापना की और नई पार्टी के अध्यक्ष बने

1996 : लोकसभा चुनाव जीतने पर प्रधानमंत्री बने, पर 13 दिन ही चली सरकार

19 मार्च 1998 : मध्यावधि चुनाव में भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन को जीत मिली, दूसरी बार बने प्रधानमंत्री

17 अप्रैल 1999 : एक वोट से विश्वास मत हारने के बाद प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दिया

13 अक्तूबर 1999 : चुनाव में जीत मिलने के बाद एक बार फिर प्रधानमंत्री पद की शपथ ली

13 मई 2004 : लोकसभा चुनाव के नतीजों में भाजपा को मिली हार के बाद प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र दिया

फरवरी 2009 : फेफड़े में संक्रमण के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया, वेंटिलेटर पर रखे गए

25 दिसंबर 2014 : सरकार ने उनके जन्म दिन को गुड गवर्नेंस डे के तौर पर मनाने का ऐलान किया।

27 मार्च 2015 : देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न देने का ऐलान किया गया।

वैसे उनके किए गए कार्यों का वर्णन इस छोटे से लेख में कतई संभव नहीं है मगर सारांश में मैंने प्रयास किया है कि अपने पाठकों को ऐसे देव दुर्लभ व्यक्तित्व का परिचय करा सकूं।

रितेश कश्यप

अटल जी की कुछ यादगार लम्हे 



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