आजादी के वे पंद्रह दिन : 1 अगस्त 1947 से 3 अगस्त 1947 - Abhivyakti | अभिव्यक्ति

Breaking

Advertisements

Thursday, 16 August 2018

आजादी के वे पंद्रह दिन : 1 अगस्त 1947 से 3 अगस्त 1947

वे पन्द्रह दिन....


*१ अगस्त, १९४७*

- प्रशांत पोळ

शुक्रवार, १ अगस्त १९४७. यह दिन अचानक ही महत्त्वपूर्ण बन गया. *इस दिन कश्मीर के सम्बन्ध में दो प्रमुख घटनाएं घटीं, जो आगे चलकर बहुत महत्त्वपूर्ण सिद्ध होने वाली थीं.* इन दोनों घटनाओं का आपस में वैसे तो कोई सम्बन्ध नहीं था, परन्तु आगे होने वाले रामायण-महाभारत में इनका स्थान आवश्यक होने वाला था

१ अगस्त को गांधीजी श्रीनगर पहुँचे, यह थी वह पहली बात. गांधीजी का यह पहला ही कश्मीर दौरा था. इससे पहले १९१५ में, अर्थात जब गांधीजी दक्षिण अफ्रीका से वापस आए ही थे, और पहला विश्वयुद्ध चल रहा था, उस समय कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने गांधीजी को कश्मीर आने के लिए व्यक्तिगत निमंत्रण दिया था. उस समय महाराज हरिसिंह की आयु केवल बीस वर्ष थी. लेकिन १९४७ में तो सारा परिदृश्य नाटकीय तरीके से बदल चुका था. अब इस समय महाराज हरिसिंह और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को गांधीजी का दौरा कतई नहीं चाहिए था. स्वयं महाराज हरिसिंह ने वायसरॉय लॉर्ड माउंटबेटन को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने लिखा कि, “...सभी दृष्टि से एवं समग्र विचार करने पर मैं आपसे कहना चाहता हूं कि महात्मा गांधी का प्रस्तावित कश्मीर दौरा इस समय रद्द किया जाना चाहिए. यदि उन्हें आना ही है तो वे शरद ऋतु समाप्त होने के पश्चात आएं. हम पुनः एक बार बताना चाहते हैं कि गांधीजी अथवा अन्य किसी भी राजनेता को कश्मीर की स्थिति सुधरने तक यहां नहीं आना चाहिए...”. कहा जा सकता है कि यह कुछ-कुछ ऐसा ही था, मानो मेजबान के इनकार के बावजूद कोई किसी के घर जाए. वैसे गांधीजी को भी इस बात की पूरी अनुभूति थी कि ‘कश्मीर अब भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए एक नाक का सवाल बन चुका हैं’.

स्वतंत्रता बस, एक पखवाड़े की दूरी पर थी. लेकिन फिर भी अभी तक कश्मीर ने अपना निर्णय घोषित नहीं किया था. इसीलिए गांधीजी भी नहीं चाहते थे कि उनके कश्मीर दौरे का अर्थ “उनके द्वारा कश्मीर के भारतीय संघ में शामिल होने हेतु कैम्पेन करना” निकाला जाए. क्योंकि यह बात उनके गढे हुए व्यक्तित्व और निर्माण की गई छवि के लिए मारक सिद्ध होती. *२९ जुलाई को कश्मीर के दौरे के लिए निकलने से पहले दिल्ली की अपनी नियमित प्रार्थना सभा में कहा था – “मैं कश्मीर के महाराज से यह कहने नहीं जा रहा हूँ, कि वे भारत में शामिल हों, या पाकिस्तान में शामिल हों.* क्योंकि कश्मीर के बारे में निर्णय लेने का अधिकार वास्तव में कश्मीरी जनता को है. उसी को यह तय करना चाहिए कि उन्हें कहां  शामिल होना है. और इसीलिए मैं कश्मीर में कोई भी सार्वजनिक कार्यक्रम नहीं करने वाला हूँ... यहां तक की प्रार्थना भी... यह सब व्यक्तिगत रूप से ही करूंगा...”.

गांधीजी रावलपिंडी मार्ग से होते हुए १ अगस्त को कश्मीर के श्रीनगर में दाखिल हुए. चूंकि इस बार उन्हें महाराजा ने निमंत्रण नहीं दिया था, इसलिए वे किशोरीलाल सेठी के घर ठहरे. उनका मकान भले ही किराए का था, परन्तु खासा बड़ा था. वर्तमान के श्रीनगर में जो बार्झुला का बोन एंड जाइंट अस्पताल है, उसके एकदम नजदीक यह घर था. सेठी साहब जंगलों के ठेकेदार थे. ये साहब कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस दोनों के नजदीकी हुआ करते थे. परन्तु इस समय नेशनल कांफ्रेंस के नेता शेख अब्दुल्ला को महाराज ने जेल में डाल रखा था. नेशनल कांफ्रेंस के अनेक नेता कश्मीर से बाहर निकाल दिए गए थे. *इन सभी नेताओं पर यह आरोप था कि वे शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में महाराज के खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं.*

इसीलिए जब एक अगस्त को जब गांधीजी रावलपिंडी मार्ग से श्रीनगर आ रहे थे, उस समय चकलाला में बख्शी गुलाम मोहम्मद और ख्वाजा गुलाम मोहम्मद सादिक, इन दोनों नेशनल कांफ्रेंस के नेताओं ने उन्हें कोहला पुल तक छोड़ा और वापस लाहौर चले गए. गांधीजी के साथ उनके सचिव प्यारेलाल और दो भतीजियां थीं. श्रीनगर में प्रवेश के बाद गांधीजी सीधे किशोरीलाल सेठी के घर गए. थोड़ा विश्राम करने के बाद उनके दल को सरोवर पर ले जाया गया.

*गांधीजी के इस सम्पूर्ण दौरे में नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ता उनके आसपास बने हुए थे.* ऐसा क्यों? क्योंकि कश्मीर के इस दौरे से पहले गांधीजी ने नेहरू के माध्यम से सारी जानकारी प्राप्त कर ली थी. कश्मीर में पंडित नेहरू के सबसे नजदीकी मित्र थे शेख अब्दुल्ला, जो कि जेल में बन्द थे. हालांकि फिर भी *शेख साहब की बेगम तथा अन्य अनुयायियों ने गांधीजी की सारी व्यवस्थाओं को अंजाम दिया.*

कश्मीर में गांधीजी से आधिकारिक रूप से भेंट करने वाले पहले शासकीय व्यक्ति थे, ‘रामचंद्र काक’. ये महाराज हरिसिंह के अत्यंत विश्वासपात्र थे. कश्मीर के प्रधान थे. नेहरू की “घृणा सूची” में सबसे पहला स्थान रखने वाले व्यक्ति थे. क्योंकि जब १५ मई १९४६ में शेख अब्दुल्ला को उनके कश्मीर विरोधी कारस्तानी के लिए जेल में ठूंसा गया था, उस समय नेहरू ने उनका मुकदमा लड़ने के लिए वकील के रूप में कश्मीर आने की घोषणा की थी. तब इन काक महाशय ने नेहरू के कश्मीर में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगाने की घोषणा की
और मुज़फ्फराबाद के पास नेहरू को गिरफ्तार भी कर लिया था. तभी से रामचंद्र काक, नेहरू को फूटी आँख नहीं सुहाते थे. रामचंद्र काक ने गांधीजी को महाराज हरिसिंह का लिखा हुआ  एक पत्र दिया जो कि सीलबंद था. वास्तव में यह पत्र गांधीजी से भेंट का निमंत्रण ही था. महाराज के “हरिनिवास” स्थित आवास पर ३ अगस्त को यह भेंट होना तय हुआ.

*नेहरू की ब्रीफिंग के अनुसार ही गांधीजी के इस सम्पूर्ण प्रवास में उनके चारों तरफ केवल नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ता ही थे.* शेख साहब की अनुपस्थिति में उनकी बेगम अकबर जहाँ और उनकी लड़की खालिदा ने गांधीजी के इस तीन दिवसीय प्रवास के दौरान कई बार भेंट की. परन्तु *१ अगस्त के दिन श्रीनगर में गांधीजी ने एक भी राष्ट्रवादी हिन्दू नेता से भेंट नहीं की.*

    --------        --------   

एक अगस्त के दिन ही दूसरी एक और महत्त्वपूर्ण घटना आकार ले रही थी, जिसके कारण आगामी अनेक वर्षों तक भारतीय उपमहाद्वीप में असंतोष और अशांति रहने वाली थी, और यह घटना भी कश्मीर के सन्दर्भ में ही थी. महाराज हरिसिंह के नेतृत्व में जो कश्मीर राज्य था, वह काफी बड़ा था. सन १९३५ में इसमें से गिलगिट एजेंसी नामक भाग अंग्रेजों ने अलग करके उसे  ब्रिटिश साम्राज्य से जोड़ दिया.

मूलतः देखा जाए तो सम्पूर्ण एवं अखंड कश्मीर एक तरह से पृथ्वी पर स्वर्ग ही है. इसके अलावा सामरिक एवं सैन्य दृष्टि से कश्मीर बहुत ही महत्त्वपूर्ण राज्य था (और है). तीन देशों की सीमाएं इस राज्य से मिलती थीं. १९३५ में दूसरा विश्वयुद्ध भले ही थोड़ा दूर था, लेकिन वैश्विक स्तर की राजनीति में बड़े परिवर्तन होने शुरू हो गए थे. रूस की शक्ति बढ़ रही थी. इसीलिए कश्मीर को रूस से जोड़ने वाला जो भाग था, अर्थात गिलगिट, उसे ब्रिटिश सत्ता ने महाराज हरिसिंह से छीन लिया. आगे चलकर झेलम में काफी पानी बह गया. दूसरा विश्वयुद्ध भी समाप्त हो गया. उस युद्ध में भाग लेने वाले सभी देश खोखले हो चुके थे. ब्रिटिश शासन ने भारत छोड़ने का निर्णय उसी समय ले लिया था. इस परिस्थिति को देखते हुए गिलगिट-बाल्टिस्तान नामक दुर्गम इलाके पर अपना नियंत्रण रखने में ब्रिटिशों की कोई रूचि नहीं बची थी. *इसीलिए उन्होंने भारत को आधिकारिक रूप से स्वतंत्रता देने से पहले, १ अगस्त के दिन गिलगिट प्रदेश, वापस महाराज हरिसिंह के हवाले कर दिया. १ अगस्त १९४७ का सूर्योदय होते ही गिलगित-बाल्टिस्तान के सभी जिला मुख्यालयों में अंग्रेजी हुकूमत का यूनियन जैक उतारकर कश्मीर का राजध्वज शान से फहराया गया.* लेकिन इस हस्तांतरण के लिए महाराज हरिसिंह कितने तैयार थे? कुछ खास नहीं.... ऐसा क्यों?

क्योंकि इस इलाके की रक्षा के लिए ब्रिटिश शासन ने ‘गिलगिट स्काउट’ नामक एक बटालियन तैनात की थी. इसमें कुछ ब्रिटिश अधिकारी छोड़ दें, तो अधिकांश सैनिक मुसलमान ही थे. १ अगस्त को गिलगिट के हस्तान्तरण के साथ ही मुस्लिमों की यह फ़ौज भी महाराज के पास आ गई. हरिसिंह ने ब्रिगेडियर घंसारा सिंह को इस प्रदेश का गवर्नर नियुक्त किया, और उनका साथ देने के लिए गिलगिट स्काउट के मेजर डबल्यू ए ब्राउन और कैप्टन एस. मेथिसन नामक अधिकारी नियुक्त किए. गिलगिट स्काउट का सूबेदार अर्थात मेजर बाबर खान भी इन लोगों के साथ था. यह नियुक्तियां करते समय महाराज हरिसिंह को बिलकुल भी अंदाजा नहीं था कि केवल दो माह तीन दिन के भीतर ही सम्पूर्ण गिलगिट स्काउट गद्दारी पर उतर आएगी. वैसा हुआ और इस टुकड़ी ने ब्रिगेडियर घंसारा सिंह को बंदी बना लिया. *१ अगस्त के दिन गिलगिट के हस्तान्तरण ने भविष्य की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का आलेख पहले से लिख दिया था.*

        --------        --------     

अखंड हिन्दुस्तान की खंडित स्वतंत्रता जब देश की दहलीज पर खड़ी थी, उस समय पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर प्रचंड नरसंहार चल रहा था. स्वतंत्रता अर्थात, विभाजन का दिन जैसे-जैसे निकट आता जाएगा, वैसे-वैसे यह नरसंहार बढ़ता ही जाएगा ऐसा ब्रिटिश अधिकारियों का अनुमान था. इसीलिए उन्होंने इन दंगों की आग को कम करने हेतु हिन्दू, मुस्लिम और सिखों की सम्मिलित सेना का प्रस्ताव रखा. इसी के अनुसार “पंजाब बाउंड्री फ़ोर्स” नामक सेना का निर्माण किया गया. इसमें ग्यारह इन्फैंट्री शामिल थीं. इस टुकड़ी में पचास हजार सैनिक थे और इनका नेतृत्व करने के लिए चार ब्रिगेडियर थे, जिनके नाम थे, मोहम्मद अयूब खान, नासिर अहमद, दिगंबर बरार और थिमय्या. १ अगस्त के दिन चारों ब्रिगेडियर्स ने लाहौर में उनके अस्थायी मुख्यालय में ‘पंजाब बाउंड्री फ़ोर्स’ बैनर तले अपने काम का प्रारम्भ किया. लेकिन *किसे पता था कि केवल अगले पन्द्रह दिनों में ही इस सम्मिलित सेना को उनका लाहौर स्थित मुख्यालय धू-धू जलता हुआ देखना पड़ेगा.*

        --------        --------     

इसी दौरान, सुदूर कलकत्ता में एक नया नाटक रचा जा रहा था....

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता एवं सुभाषचंद्र बोस के बड़े भाई अर्थात शरदचंद्र बोस ने १ अगस्त को कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया. शरदचंद्र बोस एक विराट व्यक्तित्व के धनी थे. चालीस वर्षों तक कांग्रेस में रहकर ईमानदारी एवं जी जान से लड़ने वाले व्यक्ति के रूप में उनकी पहचान थी. १९३० की ब्रिटिश इंटेलिजेंस की रिपोर्ट में उनका उल्लेख भी है. शरदचंद्र बोस और पंडित जवाहरलाल नेहरू में काफी कुछ समानता भी थी. जैसे कि दोनों का जन्म १८८९ में हुआ. दोनों की शिक्षा इंग्लैण्ड में हुई. दोनों ने वकालत की डिग्री इंग्लैण्ड से ही प्राप्त की. युवावस्था में दोनों के विचार वामपंथ की तरफ झुकते थे. आगे चलकर दोनों ही कांग्रेस में सक्रिय हुए एवं इन दोनों के आपसी सम्बन्ध काफी अच्छे थे.

लेकिन १९३७ यह समीकरण बदला, जब बंगाल के प्रान्तीय चुनावों में कांग्रेस को सबसे अधिक ५४ स्थान प्राप्त हुए. उसके बाद दूसरे नंबर पर ‘कृषक प्रजा पार्टी’ और मुस्लिम लीग, दोनों को ३७ – ३७ सीटें मिलीं. बंगाल में कांग्रेस के नेता के रूप में शरदचंद्र बोस ने कांग्रेस पार्टी और मुख्यतः नेहरू के सामने प्रस्ताव रखा कि कांग्रेस और कृषक प्रजा पार्टी को मिलकर संयुक्त सरकार स्थापना करनी चाहिए. परन्तु नेहरू ने यह प्रस्ताव अनसुना कर दिया.

सर्वाधिक सीटें जीतने के बावजूद कांग्रेस को विपक्ष में बैठना पड़ा और कृषक प्रजा पार्टी ने मुस्लिम लीग के साथ मिलकर सरकार बना ली. ‘शेर-ए-बंगाल’ के नाम से मशहूर ए. के. फजलुल हक बंगाल के प्रधानमंत्री बने. उसी समय से कांग्रेस बंगाल में कमज़ोर होती चली गई. आगे चलकर नौ वर्षों के बाद इस गलती की परिणति मुस्लिम लीग के सुहरावर्दी जैसे कट्टर मुस्लिम व्यक्ति के प्रधानमंत्री बनने में हुई. सुहरावर्दी वह कुख्यात व्यक्ति था, जिसके नेतृत्व में १९४६ में ‘डायरेक्ट-एक्शन-डे’ के नाम से पांच हजार निर्दोष हिंदुओं का नरसंहार किया गया.

उपरोक्त सारी घटनाएं शरद बाबू को व्यथित कर रही थीं. उन्होंने समय-समय पर इस सम्बन्ध में कांग्रेस नेतृत्व को, विशेषकर नेहरू को सूचित भी किया. परन्तु इसका कोई फायदा नहीं हो रहा था. नेहरू इस पर कतई ध्यान नहीं दे रहे थे. १९३९ में कांग्रेस के त्रिपुरी  (जबलपुर) अधिवेशन के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव में नेहरू ने सुभाषचंद्र बोस के विरोध में जबरदस्त कटु प्रचार किया था, उस कारण शरदचंद्र बोस का और भी चिढ़ जाना एकदम स्वाभाविक ही था. इन सारी घटनाओं के ऊपर एक और प्रहार के रूप में गांधी-नेहरू द्वारा बंगाल के विभाजन को मान्यता दे दी गई, जो कि शरद बाबू को कतई रास नहीं आया. इसीलिए अंततः उन्होंने १ अगस्त को अपने चालीस वर्षीय काँग्रेसी जीवन से त्यागपत्र दे दिया. १ अगस्त को ही शरदचंद्र बोस ने ‘सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी’ नामक पार्टी की स्थापना की एवं जनता को स्पष्ट रूप से यह बताने लगे कि *देश का विभाजन एवं देश में जो अराजकता का वातावरण निर्मित हुआ है, उसके पीछे साफतौर पर नेहरू के नेतृत्व की विफलता है.*

        --------        --------     

१ अगस्त... भारत में घटने वाली प्रचंड एवं तीव्र घटनाओं का यह दिन अब शाम में ढलने लगा था. पंजाब पूरी तरह आग और हिंसा के हवाले हो चुका था. *रात के उस भयानक अंधेरे में पंजाब, सिंध, बलूचिस्तान के सैकड़ों गांवो से उठने वाली आग की लपटें, दूर-दूर तक दिखाई दे रही थीं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के ५८,००० स्वयंसेवक पूरे पंजाब में हिंदु-सिखों की रक्षा में दिन-रात एक किए हुए थे.* ठीक इसी प्रकार बंगाल की परिस्थिति भी अराजकता की तरफ तेजी से बढ़ रही थी.

स्वतंत्रता एवं उसके साथ ही विभाजन, अब केवल चौदह दिन दूर था...!
- प्रशांत पोळवे पन्द्रह दिन

*२ अगस्त १९४७*

- प्रशांत पोळ


१७, यॉर्क रोड.... इस पते पर स्थित मकान, अब केवल दिल्ली के निवासियों के लिए ही नहीं, पूरे भारत देश के लिए महत्त्वपूर्ण बन चुका था. असल में यह बंगला पिछले कुछ वर्षों से पंडित जवाहरलाल नेहरू का निवास स्थान था. भारत के ‘मनोनीत’ प्रधानमंत्री का निवास स्थान. और इस उपनाम या पद में से ‘मनोनीत’ शब्द मात्र तेरह दिनों में समाप्त होने वाला था. क्योंकि *१५ अगस्त से जवाहरलाल नेहरू स्वतन्त्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में कार्यभार का आरम्भ करने जा रहे थे.*

१७, यॉर्क रोड.... इस पते पर अधिकारियों एवं नागरिकों की हलचल तेजी से बढ़ने लगी थी. वैसे तो यॉर्क रोड यह पहले से ही महत्त्वपूर्ण मार्ग था. बंगाल की अशांत स्थिति के कारण अंग्रेजों ने जब अपनी राजधानी कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित करने का निर्णय लिया, उस समय अर्थात १९११ में एडविन लुटियन नामक ब्रिटिश आर्किटेक्ट को ‘नई दिल्ली’ की रचना का कार्य सौंपा गया. लुटियन ने दिल्ली के इस महत्त्वपूर्ण इलाके की रचना का काम इसी यॉर्क रोड से प्रारम्भ किया था. नेहरू जिस बंगले में रह रहे थे, वह सन १९१२ में बनाया गया था.

इसी बंगले में २ अगस्त १९४७ की सुबह, बेहद व्यस्तता और आपाधापी भरी थी. ब्रिटिश साम्राज्य की तरफ से हस्तांतरण के लिए केवल तेरह दिन बाकी थे. उस कार्यक्रम की तैयारी करना तो एक प्रमुख विषय था ही, परन्तु अनेक महत्त्वपूर्ण विषय लगातार बहते झरने के समान नेहरू के सामने आते जा रहे थे. राष्ट्रगीत से लेकर मंत्रिमंडल के गठन तक की बड़ी लंबी कार्यसूची नेहरू के सामने थी. *इन सबके बीच १५ अगस्त के दिन किस प्रकार की पोशाक पहनी जाए, इतनी छोटी सी बात पर भी नेहरू ध्यान रखे हुए थे.* काँग्रेस के कुछ नेता एवं प्रशासन के कई वरिष्ठ अधिकारी १७, यॉर्क रोड पर आकर बैठे थे. उन सभी से नेहरू को अलग-अलग विषयों पर चर्चा करनी थी. इसी कारण उस दिन नेहरू ने जल्दी-जल्दी में अपना नाश्ता समाप्त किया और एक अत्यधिक व्यस्त दिन का सामना करने की तैयारी में लग गए.

        --------        ---------     
   
इधर दूसरी तरफ, भारत के स्वतंत्रता दिवस से पहले भारत में शामिल होने वाले राज्यों के बारे में कई घटनाएं लगातार घटित हो रही थीं. सरदार वल्लभभाई पटेल स्वयं एक-एक राज्य, एक-एक राजशाही पर अपनी निगाह बनाए हुए थे. इस काम के लिए उन्होंने अपने गृह विभाग में वी. के. मेनन जैसे अत्यधिक कुशल प्रशासनिक अधिकारी की नियुक्ति भी कर रखी थी. सरदार पटेल की सूचना के आधार पर २ अगस्त को प्रातः वी के मेनन ने भारत के विषय को देखने वाले विभाग के डिप्टी सेक्रेटरी सर पेट्रिक को एक पत्र लिखा. इस पत्र में उन्होंने सूचित किया कि ‘भारत में आकार एवं आर्थिक दृष्टि से जो बड़े रजवाड़े हैं, जैसे कि मैसूर, बड़ौदा, ग्वालियर, बीकानेर, जयपुर एवं जोधपुर, वह भारतीय संघ में शामिल होने के लिए तैयार हैं. फिलहाल हैदराबाद, भोपाल एवं इंदौर ने इस सम्बन्ध ने कोई निर्णय नहीं लिया है.’ इन रजवाड़ों का निर्णय अभी लंबित था.

भोपाल, हैदराबाद एवं जूनागढ़ इन तीनों रजवाड़ों की इच्छा भारत के साथ रहने की कतई नहीं थी. इसी सन्दर्भ में २ अगस्त को भोपाल के नवाब ने जिन्ना को एक पत्र लिखा. *जिन्ना और भोपाल के नवाब हमीदुल्ला दोनों अच्छे मित्र थे. अपने इस मित्र को लिखे पत्र में नवाब हमीदुल्ला ने लिखा कि ‘अस्सी प्रतिशत हिन्दू जनसंख्या वाली मेरी भोपाल रियासत इस ‘हिन्दू भारत’ में एकदम एकाकी और अलग-थलग पड़ गई है. मेरी इस रियासत को मेरे और इस्लाम के दुश्मनों ने चारों तरफ से घेर रखा है.* कल रात को ही आपने यह स्पष्ट कर दिया था कि पाकिस्तान भी हमारी कोई मदद नहीं कर सकता है.’

        --------        --------     

१, क्वीन विक्टोरिया रोड स्थित निवास में रहने वाले डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद की व्यस्तताएं भी बहुत बढ़ गयी थीं. हालांकि भविष्य में भारत के पहले राष्ट्रपति बनने में काफी समय था, परन्तु वर्तमान नेतृत्व में वे एक पितृपुरुष के समान सभी बातों पर चारों ओर ध्यान रखे हुए थे. स्वाभाविक सी बात थी कि सत्ता हस्तांतरण के इस प्रमुख एवं नाजुक समय पर उनके पास विभिन्न प्रकार की सलाह मांगने वाले अथवा अन्य मसलों पर चर्चा करने वालों की भीड़ बढ़ती ही जा रही थी. डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद मूलतः बिहार से थे. इसलिए बिहार से आने वाले अनेक प्रतिनिधिमंडल भिन्न-भिन्न प्रश्न लेकर उनके पास आते थे.

इसी बीच २ अगस्त की दोपहर को वे तत्कालीन रक्षामंत्री सरदार बलदेव सिंह को एक पत्र लिख रहे थे. यह पत्र १५ अगस्त का उत्सव मनाने के विषय में था. उन्होंने लिखा कि ‘पटना शहर में नागरिकों एवं प्रशासन के साथ सेना को भी इस उत्सव में शामिल होना चाहिए, ताकि इस कार्यक्रम की भव्यता में और भी वृद्धि होगी’.

सरदार बलदेव सिंह अकाली दल की तरफ से मंत्रिमंडल में शामिल हुए थे और वे डॉक्टर राजेन्द्रप्रसाद का बहुत सम्मान करते थे. इसलिए वे राजेन्द्र बाबू के पत्र पर समुचित कार्यवाही करेंगे, यह निश्चित ही था.

        --------        --------     

२ अगस्त की सुबह से ही संयुक्त प्रांत में (यानी वर्तमान उत्तरप्रदेश में) एक अलग ही नाटक खेला जा रहा था. *इस प्रदेश की हिन्दू महासभा के नेताओं को सरकार ने गत रात्रि को ही गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था.* इन पर आरोप लगाया गया था कि महासभा के नेतागण सरकार के विरुद्ध ‘’डायरेक्ट एक्शन’ का शंखनाद करने वाले हैं. *‘डायरेक्ट एक्शन’ नामक शब्द भारतीय राजनीति में बदनाम हो चुका था, क्योंकि केवल एक वर्ष पहले ही बंगाल में मुस्लिम लीग के हिंसक गुण्डों ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ के नाम पर पांच हजार से अधिक हिंदुओं का कत्लेआम एवं हजारों स्त्रियों के साथ बलात्कार किया था.*

काँग्रेस कार्यसमिति ने आगे चलकर विभाजन का जो प्रस्ताव स्वीकार किया, उसके पीछे ‘डायरेक्ट एक्शन’ शब्द की पाशविक स्मृतियां प्रमुख रूप से थीं. इस कारण ‘डायरेक्ट एक्शन’ के नाम से हिन्दू नेताओं को उठाकर जेल में ठूंसना बड़ा ही विचित्र मामला था, क्योंकि *इस शब्द का उपयोग केवल मुस्लिम लीग से ही जोड़ा जा सकता था.* यहां तक कि इस विचित्र समाचार को सिंगापुर से प्रकाशित होने वाले ‘इन्डियन डेली मेल’ नामक दैनिक ने भी प्रमुखता दी. शनिवार २ अगस्त के अंक में बिलकुल प्रथम पृष्ठ पर उन्होंने यह समाचार प्रकाशित किया था. इस समाचार के साथ ही हिन्दू महासभा की दस प्रमुख माँगें भी प्रकाशित की थीं. इस समाचार के कारण हिन्दू महासभा के समर्थकों में बेचैनी का वातावरण निर्मित हो गया था.

        --------        --------   

उधर सुदूर ईस्टर्न फ्रंट के ‘कोहिमा’ से शनिवार २ अगस्त को एक और समाचार ने धमाका किया, जो कि भारतीय संघ राज्य के लिए अच्छी बात नहीं थी. ‘इंडिपेंडेंट लीग ऑफ कोहिमा’ ने ऐसी घोषणा की, कि १५ अगस्त को वे भारतीय संघ राज्य में शामिल नहीं हो रहे हैं. वे एक निर्दलीय नागा सरकार का गठन करेंगे, जिसमें नागा जनजाति की जनसंख्या वाला सम्पूर्ण प्रदेश होगा. १५ अगस्त को आकार ग्रहण करने जा रहे भारतीय संघ राज्य के सामने एक के बाद एक लगातार चुनौतियां खड़ी होती जा रही थीं.

        --------        --------     

इन सब तनाव भरी ख़बरों की पृष्ठभूमि में देश-विदेश में भारतीय फ़िल्में लोगों का मनोरंजन कर ही रही थीं. सिंगापुर के डायमंड थियेटर में अशोक कुमार एवं वीरा अभिनीत फिल्म ‘आठ दिन’ काफी भीड़ खींच रही थी. इस फिल्म की कहानी उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार सआदत हसन मंटो ने लिखी थी और संगीतकार एस. डी. बर्मन ने इसी फिल्म के द्वारा भारतीय फिल्म जगत में पहला कदम रखा था.

        --------        --------   

सरदार पटेल के दिल्ली स्थित निवास (यानी वर्तमान में १, औरंगजेब रोड) पर भी हलचलें तेज़ हो चुकी थीं. राज्यों के विलीनीकरण एवं साथ ही सिंध, बलूचिस्तान एवं बंगाल में भड़के हुए दंगे, इत्यादि तमाम मुद्दों पर गृह मंत्रालय की परीक्षा जारी थी. इसी समय दोपहर को सरदार पटेल को पंडित नेहरू द्वारा लिखा एक पत्र प्राप्त हुआ. पत्र छोटा सा ही था. उसमें नेहरू ने लिखा था – *“देखा जाए तो केवल एक औपचारिकता के नाते मैं आपको यह पत्र भेज रहा हूं. मैं आपको अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का निमंत्रण देना चाहता हूं. वैसे तो इस पत्र का कोई विशेष अर्थ नहीं है, क्योंकि आप तो पहले से ही मेरे मंत्रिमंडल के सुदृढ़ स्तंभ हैं...”.*

सरदार पटेल ने वह पत्र ग्रहण किया. थोड़ी देर उस पत्र की तरफ देखा. हल्के से मुस्कुराए और तत्काल ही वे भारत-पाकिस्तान की सीमा (जो कि अभी तक घोषित नहीं हुई थी) पर भड़के हुए भीषण दंगों के बारे में अपने सचिव से चर्चा करने लगे.

        --------        --------   

दिल्ली की इस आपाधापी और व्यस्तता के बीच उधर दूर महाराष्ट्र में आलंदी नामक स्थान पर काँग्रेस के अंदर वामपंथी विचारों वाले नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ था. इस अंदरूनी वामपंथी समूह ने दो माह पहले ही तय कर लिया था कि २ और ३ अगस्त को इस समूह की बैठक होगी. शंकरराव मोरे एवं भाऊसाहेब राउत के आव्हान पर काँग्रेस की यह वामपंथी मण्डली वहां जमा हुई थी. भारत स्वतन्त्र होने वाला है और इस स्वतन्त्र भारत की चाभी अब काँग्रेस के हाथों में आने वाली है, यह उन्हें स्पष्ट रूप से दो माह पहले ही दिख गया था. अब इस समूह के सामने बड़ा सवाल यह था कि सत्ता हस्तांतरण की इस प्रक्रिया में वामपंथी और साम्यवादियों का क्या होगा? इसी का विचार मंथन करने के लिए यह बैठक दिल्ली से बहुत दूर बुलाई गई थी.

काँग्रेस के लिए काम कर रहे, लेकिन विचारों से वामपंथी, अनेक नेता जैसे तुलसीदास जाधव, कृष्णराव धुलूप, ज्ञानोबा जाधव, दत्ता देशमुख, र. के. खाडिलकर, केशवराव जेधे जैसे नामचीन और वरिष्ठ नेता इस बैठक में आए थे. काँग्रेस के अंदर ही मजदूरों एवं किसानों के लिए एक अलग कार्यकर्ता संघ की स्थापना करने की उनकी योजना थी. किसी ने सोचा भी न था कि इस बैठक से ही आगे चलकर भविष्य में महाराष्ट्र की एक प्रमुख और बड़ी वामपंथी विचारों का पोषण करने वाली तथा किसान-मजदूरों का पक्ष रखने वाली पार्टी जन्म लेगी. *२ अगस्त को संपन्न हुई इस बैठक में इन बड़े वामपंथी नेताओं ने भारत विभाजन अथवा भीषण पाशविक अत्याचारों से युक्त दंगों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा.. इन्हें केवल काँग्रेस में अपने भविष्य की चिंता सता रही थी.*

        --------        --------     

दो अगस्त को ही मद्रास के एग्मोर इलाके में शाम को एक विशाल सभा में मद्रास प्रेसीडेंसी के खाद्य, औषधि एवं स्वास्थ्य मंत्री टी. एस. एस. राजन, एंग्लो इन्डियन समुदाय से संवाद स्थापित करने में लगे हुए थे. अंग्रेजों के जाने के बाद एंग्लो इंडियन समुदाय का क्या होगा यह प्रश्न अनेकों के मन में शंकाएं उत्पन्न कर रहा था.

इस समुदाय को आश्वस्त करते मंत्री महोदय ने कहा कि आपके इस छोटे से समुदाय ने अभी तक उत्तम पद्धति एवं संस्कार दिखाते हुए भारतीय समाज में मिल-जुलकर रहने की शानदार मिसाल पेश की है. आगे भी स्वतंत्रता के पश्चात आपको एक जिम्मेदार नागरिक की भूमिका निभानी है. काँग्रेस आपका पूरा ध्यान रखेगी.

        --------        --------   

उधर पूना में हिन्दू महासभा ने एस. पी. कॉलेज पर एक सार्वजनिक सभा आयोजित की थी. देश की वर्तमान परिस्थिति, देश की स्वतंत्रता एवं विभाजन की घटनाओं पर इस सभा में स्वयं वीर सावरकर अपना भाषण देने वाले थे.

देखते ही देखते सभा में जबदरस्त भीड़ हो गई. इसे सच में एक ‘विशाल आमसभा’ कहा जा सकता था. अपने गरजदार और वैचारिक आग से भरे भाषण में स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने कहा कि, *आज देश में जो परिस्थिति निर्मित हुई है, इसके लिए प्रमुखता से केवल काँग्रेस ही नहीं सामान्य जनता भी उतनी ही जिम्मेदार है. जनता ने समय-समय पर आंख मूंदकर लगातार काँग्रेस को जो समर्थन दिया, देश का विभाजन उसी की परिणति है.* काँग्रेस के नेताओं द्वारा बारंबार एक ही वर्ग का तुष्टिकरण करने की वजह से यह वर्ग और इसके नेता विभाजन करने में सफल हुए हैं.

    ____    ____ 

उधर श्रीनगर में गांधीजी की पहली बहुप्रचारित यात्रा का आज दूसरा दिन समाप्त होने जा रहा हैं. आज का दिन कोई खास महत्त्वपूर्ण घटनाओं से भरा हुआ नहीं था. सुबह की प्रार्थना के पश्चात गांधीजी के ठिकाने, अर्थात किशोरीलाल सेठी के निवास स्थान, पर अकबर जहाँ अपनी बेटी को लेकर आईं. *इस मुलाक़ात में भी उन्होंने गांधीजी के सामने बार-बार यही सिद्ध करने का प्रयास किया कि उनके शौहर अर्थात शेख अब्दुल्ला को जेल से रिहा किया जाना कैसे और क्यों जरूरी है.*

आज के दिन भी गांधीजी के चारों तरफ नेशनल कांफ्रेंस के ही मुस्लिम नेताओं का चुस्त घेरा बना हुआ था. हालांकि आज गांधीजी ने अनेक लोगों से भेंट की, जिसमें हिन्दू नेता भी थे. रामचंद्र काक द्वारा दिए गए निमंत्रण के अनुसार कल, अर्थात ३ अगस्त को गांधीजी, कश्मीर के महाराजा हरिसिंह से भेंट करने वाले हैं.

        --------        --------     

आज के दिन भी लाहौर, रावलपिंडी, पेशावर, चटगाँव, ढाका, अमृतसर इत्यादि स्थानों से लगातार हिन्दू-मुस्लिम दंगों की ख़बरें आती रही हैं. *जैसे-जैसे रात का अंधेरा गहरा होता जा रहा हैं, वैसे-वैसे सम्पूर्ण प्रदेश के क्षितिज पर आग और धुएं की बड़ी-बड़ी लपटें दिखाई देने लगीं हैं...* दो अगस्त की यह काली और भयानक रात ऐसी ही अशांत रहने वाली हैं...
 - प्रशांत पोळवे पंद्रह दिन
       

*३ अगस्त, १९४७*     

- प्रशांत पोळ

आज के दिन गांधीजी की महाराजा हरिसिंह से भेंट होना  तय थी. इस सन्दर्भ का एक औपचारिक पत्र कश्मीर रियासत के दीवान, रामचंद्र काक ने गांधीजी के श्रीनगर में आगमन वाले दिन ही दे दिया था. आज ३ अगस्त की सुबह भी गांधीजी के लिए हमेशा की तरह ही थी. अगस्त का महीना होने के बावजूद किशोरीलाल सेठी के घर अच्छी खासी ठण्ड थी. अपनी नियमित दिनचर्या के अनुसार गांधीजी मुंह अंधेरे ही उठ गए थे. उनकी नातिन ‘मनु’ तो मानो उनकी परछाईं समान ही थी. इस कारण जैसे ही गांधीजी उठे, वह भी जाग गयी थी.

मनु गांधीजी के साथ ही सोती थी. लगभग एक वर्ष पूर्व अपने नोवाखाली दौरे के समय गांधीजी मनु को अपनी बांहों में लेकर सोते थे. यह उनका ‘सत्य के साथ एक प्रयोग’ था. एक अत्यंत पारदर्शी एवं स्वच्छ मन वाले गांधीजी के अनुसार इसमें कुछ भी गलत नहीं था. हालांकि इस खबर की बहुत गर्मागर्म चर्चाएं हुईं. कांग्रेस के नेताओं ने इस मामले में कुछ भी बोलना उचित नहीं समझा, वे मौन ही बने रहे. जबकि देश के कई भागों में ‘सत्य के इस कथित प्रयोग’ के बारे में विरोधी जनमत स्पष्ट रूप से प्रकट होने लगा था. अंततः बंगाल का अपना दौरा समाप्त करके जब गांधीजी बिहार के दौरे पर निकले, उस समय मनु उनसे अलग हो गयी.

इधर श्रीनगर में ऐसा कुछ भी नहीं था. गांधीजी और मनु की वैसी ख़बरें पीछे रह गयी थीं. अपनी नातिन के साथ गांधीजी का रहना-सोना अब कौतूहल की बात नहीं थी. बहरहाल... सूर्योदय से पहले ही गांधीजी की प्रातः प्रार्थना पूर्ण हो चुकी थी, और वे उनके ठहरने के स्थान की साफसफाई में लग गए थे. सारी नित्य क्रियाएं संपन्न होने के बाद लगभग ग्यारह बजे गांधीजी कश्मीर के महाराज हरिसिंह के ‘गुलाब भवन’ नामक राजप्रासाद में पहुंचे. भले ही गांधीजी की यह भेंट महाराज की इच्छा के विरुद्ध थी, परन्तु फिर भी महाराज ने गांधीजी के स्वागत में कोई भी कमी नहीं छोड़ी थी. स्वयं महाराज हरिसिंह, महारानी तारादेवी सिंह, राजप्रासाद के विशाल प्रांगण में गांधीजी के स्वागत हेतु खड़े थे. युवराज कर्णसिह भी वहां अपने शाही अंदाज़ में स्वागत हेतु तत्पर थे. महारानी तारादेवी ने तिलक एवं आरती के साथ उनका परम्परागत स्वागत किया.

_(उस गुलाब भवन नामक राजप्रासाद के जिस वृक्ष के नीचे गांधीजी और महाराज की भेंट हुई थी, उस वृक्ष पर इस भेंट की स्मारिका के बतौर एक ताम्र पट्टिका लगाई गयी है. हालांकि उस ताम्र पट्टिका पर इन दोनों की भेंट की दिनांक गलत लिखी गयी है. गांधीजी महाराज हरिसिंह से ३ अगस्त १९४७ को मिले थे, जबकि इस ताम्र पट्टिका में जून १९४७ ऐसा लिखा है)._

उस दिन राजप्रासाद में विचरण करते समय गांधीजी के चेहरे पर किसी किस्म का दबाव या तनाव नहीं दिखाई दे रहा था. वे अत्यंत सहजता से वहां घूम-फिर रहे थे. महाराज हरिसिंह और गांधीजी के बीच लम्बी चर्चा हुई. *परन्तु इस समूची चर्चा में गांधीजी ने महाराज को ‘भारत में शामिल हों’ ऐसा एक बार भी नहीं कहा. यदि गांधीजी ने वैसा कहा होता, तो उनके मतानुसार यह उचित नहीं होता. क्योंकि गांधीजी का ऐसा मानना था कि वे भारत और और पाकिस्तान, दोनों देशों के पितृपुरुष हैं.* हालांकि दुर्भाग्य से उन्हें यह जानकारी ही नहीं थी कि पाकिस्तान मांगने वाले मुसलमान उन्हें एक ‘हिन्दू नेता’ ही मानते हैं. उनका द्वेष करते हैं. और इसीलिए पाकिस्तान में गांधीजी का रत्ती भर भी सम्मान और स्थान नहीं हैं.

अंग्रेजों के चले जाने के बाद कश्मीर रियासत को कौन सी भूमिका निभानी चाहिए, अथवा कौन सा निर्णय लेना चाहिए, इस सम्बन्ध में गांधीजी को कुछ कहना ही नहीं था. इसलिए महाराज और उनके बीच कोई राजनैतिक चर्चा हुई ही नहीं. अलबत्ता गांधीजी की इस ‘निरपेक्ष’ भेंट के परिणामस्वरूप नेहरू का ‘कश्मीर एजेण्डा’ लागू करने में मदद मिली. तीन अगस्त को यह भेंट हुई और दस अगस्त को महाराज के विश्वासपात्र और नेहरू को कैद में ठूंसने वाले कश्मीर रियासत के दीवान रामचंद्र काक को महाराज ने अपनी सेवाओं से मुक्त कर दिया. दूसरा परिणाम यह रहा की नेहरू के ख़ास मित्र, यानी शेख अब्दुल्ला, को कश्मीर की जेल से २९ सितम्बर को छोड़ दिया गया.

सरसरी तौर पर देखा जाए तो गांधीजी की इस भेंट का परिणाम इतना ही दिखाई देता है. *परन्तु यदि गांधीजी ने इन दोनों मांगो के अलावा, इसी के साथ महाराज हरिसिंह से भारत में शामिल होने का अनुरोध किया होता, या वैसी सलाह दी होती, तो तय जानिये कि अक्टूबर १९४७ से काफी पहले, अगस्त १९४७ में ही कश्मीर का भारत में विलीनीकरण हो चुका होता.* आज कश्मीर के जो ज्वलंत प्रश्न देश के सामने खड़े हैं, वे उत्पन्न ही नहीं होते.

किन्तु ऐसा होना न था...

        --------        --------     

मंडी.

हिमालय की गोद में बसा हुआ एक छोटा सा शहर. मनु ऋषि के नाम पर इसका नाम मंडी पड़ा है. व्यास (बिआस) नदी के किनारे पर स्थित यह स्थान नयनाभिराम एवं प्राकृतिक दृश्यों से भरपूर है. १९४७ में यह सुन्दर इलाका भी अपने-आप में एक रियासत था. परन्तु इस रियासत के राजा के मन में भी यही बात चल रही थी, कि अंग्रेजों की दासता से मुक्त होने के बाद मंडी स्वतंत्र ही रहे. भारत में शामिल न हो. इसी प्रकार मंडी के पड़ोस में स्थित ‘सिरमौर’ राज्य के राजा ने भी भारत में विलीन न होने की बात रखते हुए उसे स्वतंत्र रखने का निश्चय किया था. हालांकि ये सभी बेहद छोटी-छोटी रियासतें यह भी समझ रही थीं, कि जब कई बड़ी रियासतें मिलकर एक बड़ा देश बन ही रहा है, तो उनका स्वतंत्र रहना संभव नहीं होगा.

इसी बीच उन्हें यह जानकारी मिली कि कश्मीर के महाराज भी अपनी रियासत को स्वतंत्र रखने के विचार में हैं. तब इन्होंने यह योजना बनाई कि जम्मू-कश्मीर, पंजाब और शिमला इत्यादि के पहाड़ी राज्यों का एक वृहद संघ बनाकर उसे भारत से स्वतंत्र ही रखा जाए. इसी सिलसिले में मंडी और सिरमौर, दोनों राज्यों के राजाओं ने पिछले हफ्ते ही लॉर्ड माउंटबेटन से भेंट की थी. पहाड़ी राज्यों के एक वृहद संघ संबंधी प्रस्ताव पर विचार करने के लिए और समय चाहिए, ऐसी मांग रखी थी. इन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि फिलहाल भारत में शामिल होने के संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करना संभव नहीं है. अभी हमें और समय चाहिए.

दिल्ली स्थित अपने भव्य एवं प्रभावशाली वायसरॉय कार्यालय में बैठे लॉर्ड लुई माउंटबेटन इन दोनों राजाओं का पत्र बार-बार पढ़ रहे थे. असल में जितने अधिक राजे-रजवाड़े स्वतंत्र रहने का आग्रह करते, देश छोड़ते समय अंग्रेजों के सामने उतनी अधिक दिक्कतें पैदा होतीं. इसीलिए ऐसे छोटी-छोटी रियासतों का स्वतंत्र रहना, या भारत में शामिल होने से असहमति व्यक्त करना, माउंटबेटन को सख्त नापसंद था. लेकिन फिर भी लोकतंत्र और अपने पद का सम्मान रखने की खातिर माउंटबेटन ने इसी सन्दर्भ में सरदार पटेल को एक पत्र लिखना आरम्भ किया.

तीन अगस्त की दोपहर, सरदार पटेल को यह पत्र लिखते समय (और यह जानते-बूझते हुए भी कि इस पत्र पर कोई अनुकूल निर्णय होने वाला नहीं है), माउंटबेटन ने मंडी और सिरमौर, दोनों राजाओं को विलीनीकरण के पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए थोड़ा और समय देने का अनुरोध सरदार पटेल से किया.

        --------        --------     

डॉक्टर बाबासाहब आंबेडकर आज दिल्ली में ही थे. पिछले कुछ दिनों से उनके पास भी तरह-तरह के कामों की भीषण व्यस्तता थी. उनके ‘शेड्यूल कास्ट फेडरेशन’ नामक संगठन के कार्यकर्ता, देश भर से विविध कामों के लिए एवं उनका मार्गदर्शन लेने के लिए दिल्ली आ रहे थे. दर्जनों पत्र लिखने-पढ़ने बाकी थे. परन्तु बाबासाहब को यह परिस्थिति बड़ी रुचिकर लगती थी. अर्थात *जितना अधिक काम होगा, वे अपने काम में गहराई और गंभीरता से डूब जाना पसंद करते थे. ऐसे विभिन्न कामों का बोझ तो उनके लिए उत्सव के समान ही था.*

इसीलिए जब पिछले सप्ताह नेहरू ने उन्हें आगामी मंत्रिमंडल में शामिल होने के सम्बन्ध में पूछा था, तब बाबासाहब ने उसका सकारात्मक उत्तर दिया. बाबासाहेब ने कहा कि “क़ानून मंत्रालय में कोई खास काम नहीं है, इसलिए मुझे कोई ऐसी जिम्मेदारी दीजिए, जिसमें बहुत सारा काम करना पड़े.” नेहरू हंसे और बोले, “निश्चित ही, एक बहुत बड़ा काम मैं आपको सौंपने जा रहा हूं”.

और आज दोपहर को ही प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का पत्र बाबासाहब आंबेडकर को मिला. इस पत्र के माध्यम से उन्होंने बाबासाहब को स्वतंत्र भारत का पहला क़ानून मंत्री नियुक्त किया था. बाबासाहब और उनकी शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के लिए यह बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं आनंददायक अवसर था.

        --------        --------     

इधर दिल्ली की इस अगस्त वाली उमस भरी भयानक गर्मी में सिरिल रेडक्लिफ साहब को बहुत कष्ट हो रहा था. ब्रिटेन के यह निर्भीक एवं निष्पक्ष माने जाने वाले न्यायाधीश महोदय भारत के विभाजन की योजना पर काम करने के लिए मुश्किल से तैयार हुए थे. प्रधानमंत्री एटली ने उनकी न्यायप्रियता एवं बुद्धिमानी को देखते हुए लगभग जिद पकड़ते हुए उन्हें इस काम के लिए राजी किया था. इसमें पेंच यह था कि माउंटबेटन को भारत का विभाजन करने के लिए कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए था, जिसे भारत के बारे में कोई खास जानकारी नहीं हो. न्यायमूर्ति रेडक्लिफ इस कसौटी पर खरे उतरते थे.

दिल्ली आने पर ‘कुछ भी जानकारी नहीं होना’ यह कितना बड़ा बोझ और सिरदर्द है, यह रेडक्लिफ साहब को जल्दी ही समझ में आ गया. एक अत्यंत विशाल प्रदेश, जिसमें नदियां, नाले, पहाडियों का प्रचंड जाल बिछा हुआ हैं. ऐसे विस्तीर्ण प्रदेश के नक़्शे पर एक ऐसी विभाजक लकीर खींचना, जिसके कारण हजारों परिवारों का सब कुछ उजड़ जाने वाला हैं. पीढ़ियों से रह रहे लाखों परिवारों के लिए अचानक कोई जमीन पराई हो जाने वाली हैं... बहुत कठिन कार्य था यह..!

रेडक्लिफ साहब को इस कार्य के जटिलता की पूरी जानकारी थी और वे उनकी क्षमता के अनुसार, पूरी निष्पक्षता के साथ विभाजन करने का प्रयास भी कर रहे थे. उनके बंगले के तीन बड़े-बड़े कमरे, तरह-तरह से कागजों से और भिन्न-भिन्न प्रकार के नक्शों से पूरी तरह भर चुके थे. आज ३ अगस्त के दिन उनका काफी सारा काम लगभग खत्म हो चुका था. पंजाब के कुछ विवादित क्षेत्रों का बंटवारा अभी बाकी रह गया था, जिस पर वे अपना अंतिम विचार कर रहे थे. इसी बीच उन्हें मेजर शॉर्ट का लिखा हुआ एक पत्र प्राप्त हुआ. मेजर शॉर्ट एक सैनिक मानसिकता वाला, पक्का ब्रिटिश अधिकारी था. भारत की सामान्य जनता की प्रतिक्रियाएं एवं राय, रेडक्लिफ साहब तक पहुंचाने के लिए उसने यह पत्र लिखा था. उस पत्र में उसने स्पष्ट शब्दों में लिखा था कि *‘जनता का ऐसा मानना है कि माउंटबेटन जैसा चाहेंगे, रेडक्लिफ बिना विरोध किए बिलकुल वैसा ही निर्णय देंगे’.*

रेडक्लिफ इस पत्र पर विचार करते रहे. पत्र का यह हिस्सा वास्तव में सच ही था, क्योंकि रेडक्लिफ पर माउंटबेटन का गहरा प्रभाव तो निश्चित ही था.

       --------        --------     

तीन अगस्त की दोपहर लगभग चार बजे, १७, यॉर्क हाउस स्थित जवाहरलाल नेहरू के निवास से एक प्रेसनोट जारी किया गया. चूंकि राजनैतिक गहमागहमी के दिन थे, तो रोज ही कोई न कोई प्रेसनोट निकलता था अथवा प्रेस कांफ्रेंस आयोजित होती ही थी. परन्तु आज की प्रेसनोट देश और पत्रकारों के लिए विशेष महत्त्व रखती थी.

*इस प्रेसनोट के माध्यम से नेहरू जी ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों के नाम घोषित किए थे. यह स्वतंत्र भारत का पहला मंत्रिमंडल था.* इसीलिए इस प्रेसनोट का अपने-आप में एक विशिष्ट महत्त्व था. इस प्रेसनोट में नेहरू ने अपने सहयोगियों के नाम क्रमानुसार दिए थे, जो कि इस प्रकार थे. –

- सरदार वल्लभभाई पटेल
- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद
- डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद
- डॉक्टर जॉन मथाई
- जगजीवन राम
- सरदार बलदेव सिंह
- सी. एच. भाभा
- राजकुमारी अमृत कौर
- डॉक्टर भीमराव आंबेडकर
- डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी
- षणमुगम चेट्टी
- नरहरि विष्णु गाडगिल

इन बारह सदस्यों में से राजकुमारी अमृत कौर एकमात्र महिला थीं, जबकि डॉक्टर बाबासाहब आंबेडकर शेड्यूल कास्ट फेडरेशन पार्टी के, डॉक्टर श्यामाप्रसाद मुखर्जी हिन्दू महासभा के, और सरदार बलदेव सिंह पंथिक पार्टी के प्रतिनिधि के रूप में मंत्रिमंडल में लिए गए थे.

        ---------         --------     

उधर सुदूर पश्चिम में राममनोहर लोहिया का एक प्रेसनोट अखबारों के कार्यालयों में पहुंच चुका था, जिसने लाखों गोवा निवासियों को निराश कर दिया था. लोहिया ने अपने प्रेस नोट के माध्यम से यह सूचित किया था, कि ‘गोवा की स्वतंत्रता, भारत की स्वतंत्रता के साथ में होना संभव नहीं है. इस कारण गोवा के निवासी अपनी स्वतंत्रता की लड़ाई आगे जारी रखें...’.

       --------        --------       

विभाजन की भीषण घटनाओं एवं इस त्रासदी से दूर, उधर महाराष्ट्र में आलंदी नामक स्थान पर काँग्रेस में काम करने वाले कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की बैठक का आज दूसरा एवं अंतिम दिन था. कल से ही इन वामपंथी कार्यकर्ताओं में मंथन का दौर जारी था.

अंततः यह तय किया गया कि *काँग्रेस के अंदर ही एक साम्यवादी विचारों वाला तथा किसानों-मजदूरों के हितों की बात करने वाला, एक शक्तिशाली गुट निर्माण किया जाए.* शंकरराव मोरे, केशवराव जेधे, भाऊसाहेब राउत, तुलसीदास जाधव इत्यादि नेताओं द्वारा इस आंतरिक गुट का नेतृत्व सामूहिक रूप से किया जाए, यह भी तय किया गया. अर्थात अब महाराष्ट्र में एक नए साम्यवादी दल का उदय होने जा रहा था.

        --------        ---------   

श्रीनगर में गांधीजी के प्रवास का आज अंतिम दिन था. कल सुबह वे जम्मू के लिए निकलने वाले थे. इस कारण आज शाम उनकी मेजबानी बेगम अकबर जहाँ करने वाली थीं. उन्होंने बाकायदा गांधीजी को शाम के भोजन हेतु निमंत्रण दिया था. *चूंकि शेख अब्दुल्ला पर गांधीजी का अत्यधिक स्नेह था, इसलिए इस भोजन के निमंत्रण को ठुकराने का सवाल ही नहीं था. भले ही शेख अब्दुल्ला जेल में थे, किन्तु उनकी अनुपस्थिति में बेगम साहिबा ने गांधीजी की अगवानी और स्वागत की जबरदस्त तैयारी की थी. नेशनल कांफ्रेंस के कार्यकर्ता स्वयं सारी व्यवस्था देख रहे थे.* यहां तक कि खुद बेगम साहिबा और उनकी लड़की खालिदा, यह दोनों भी गांधीजी के स्वागत के लिए दरवाजे पर ही खड़ी रहीं.

जब गांधीजी ने इस शेख अब्दुल्ला परिवार के इस राजसी ठाटबाट को देखा, तो वे बेचैन हो गए. यह इंतजाम उनकी कल्पना से परे था. उन्होंने सोचा ही नहीं था कि उनकी मेजबानी ऐसे शाही अंदाज में होगी. उन्होंने बेगम साहिबा के समक्ष अपनी हलकी अप्रसन्नता व्यक्त की. लेकिन फिर भी गांधीजी उस पार्टी में पूरे समय रुके रहे.

        --------        --------     

तीन अगस्त की काली एवं बेचैन रात धीरे-धीरे आगे सरक रही थी. *लाहौर की तरफ से, पठानकोट की तरफ से, और उधर बंगाल से, लाखों सम्पन्न परिवार शरणार्थी के रूप में इस खंडित भारत के अंदर धीरे-धीरे आगे बढ़ते जा रहे थे.* उन्हें अपने प्राणों का भय था. जीवन भर की कमाई और चल-अचल संपत्ति को पूर्वी एवं पश्चिमी पाकिस्तान में छोड़कर भागने की मर्मान्तक पीड़ा थी. भारत में शरणार्थी बनने की विकलता थी. भूख, प्यास, थके हुए शरीर, बीवी-बच्चों के भीषण कष्ट इत्यादि सहन करने के त्रासदी थी. लेकिन उधर दिल्ली में राजनीती अपनी गति से जारी ही थी.

अधिकृत रूप से भारत के विभाजन में अब केवल बारह रातें ही बाकी बची थीं...!
-  प्रशांत पोळ

Related Post : 




No comments:

Post a Comment